काबा में शिव जी के कैद होने का मिथ

 (अगस्त, 2014, ज़िया इम्तियाज़)

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... अक्सर कुछ दिग्भ्रमित हिंदू भाई हमें ये कहते मिल जाते हैं, कि मक्का मदीना मे मुस्लिमों ने भगवान शिव को कैद कर के रखा है,और काबा शरीफ की दीवार पर लगे जिस काले पत्थर को मुस्लिम हजरे अस्वद कहते हैं वो पत्थर वास्तव मे शिवलिंग है जिसकी ये मुस्लिम पूजा करते हैं ।

..... अपने भोले हिंदू भाईयों का ये तर्क सुनकर मै चकित रह जाता हूँ, कि भला त्रिकालव्यापी सर्वशक्तिमान ईश्वर को कोई व्यक्ति कहीं बंधक बनाकर कैसे रख सकता है ....??? .. क्या आप सोच सकते हैं कि भगवान इतना शक्तिहीन होगा कि 1400 वर्षों मे भी खुद को बंधक बनाने वाले अधर्मियों की कैद से मुक्त नही करा पाया ??


.............. खैर, 

... मै समझता हूँ कि हजरे अस्वद का सही परिचय और स्पष्ट इतिहास न जानने के कारण मेरे हिन्दू भाईयों को ये भ्रम हो गया है कि काबा शरीफ मे लगा हजरे अस्वद किसी प्रकार शिव जी से सम्बन्धित है .....तो भाईयों मैं आपका भ्रम दूर करना चाहूँगा


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...हजरे अस्वद काबा के दक्षिणी कोने में लगा एक काला पत्थर है जो ज़मीन से डेढ़ मीटर की उंचाई पर काबा की दीवार में लगाया गया है. हजरे अस्वद , जन्नत से आया हुआ पत्थर है जो कि काबा का तवाफ़ (परिक्रमा) करने वालों के लिए एक निशानी है और वोह यहीं से अपना तवाफ़ आरम्भ करते हैं तथा यहीं पर समाप्त करते हैं, ताकि तवाफ की गिनती बिना किसी कन्फ्यूजन के सही सही पूरी की जा सकें.... हजरे अस्वद काबा शरीफ मे कब और किस प्रकार आया इस विषय ये रिवायत है , कि इब्राहीम अलैहिस्सलाम जब काबा का निर्माण कर रहे थे तथा पत्थर जोड़ते जोड़ते एक कोने तक पहुंचे जहां उपयुक्त पत्थर लगाने के लिए उन्होंने अपने पुत्र इस्माइल अलैहिस्सलाम जो निर्माण में उनकी सहायता कर रहे थे एवं पत्थर ढो कर ला रहे थे, से कहा कि एक ऐसा पत्थर लाओ जिसे मैं इस स्थान पर लगा दूं, अतः इस्माइल अलैहिस्सलाम पत्थर लाने गए.... जब वापस आये तो देखा कि एक पत्थर उस स्थान पर पहले से लगा मौजूद है, 

तो हजरत इस्माईल ने पूछा : अब्बा यह पत्थर कहाँ से आया ?

इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने जवाब दिया कि ये पत्थर जिब्रील अलैहिस्सलाम ने लाकर दिया है....

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.... क्योंकि दुनिया मे अपने आगमन से लेकर आज तक हजरे अस्वद लगातार काबा शरीफ़ की पवित्र दीवार मे लगा हुआ है, इसलिए इस पत्थर को कभी शिवलिंग के रूप मे पूजे जाने की सम्भावना क्षीण है... हज के दौरान जब मुसलमान काबा शरीफ के सात चक्कर लगाते हैं, तो परिक्रमा इसी हजरे अस्वद से शुरू होती है, और काबे के चारों ओर घूम कर वापस इसी पत्थर के सामने पहुंच कर एक परिक्रमा पूरी होती है ...प्रत्येक बार इस पत्थर के सम्मुख पहुंच कर हाजी इस पत्थर को चूमते हैं, इस कारण गैर मुस्लिमों को ये भ्रम होता है कि मुस्लिम उस काले पत्थर की पूजा करते हैं.... लेकिन ऐसा नही है, पूजा का अर्थ है किसी वस्तु को ईश्वर मानकर या किसी वस्तु को हमारी इच्छापूर्ति करने वाली दैवीय शक्तियों से युक्त मानकर उसके साथ कोई कर्मकाण्ड करना, लेकिन मुस्लिम न तो हजरे अस्वद को ईश्वर मानते हैं, न ही उसे इच्छापूर्ति करने वाली दैवीय शक्तियों से युक्त ही मानते हैं 


..... बल्कि हजरे अस्वद को चूमते वक्त मुस्लिमों के ध्यान मे हजरत उमर बिन खत्ताब रज़ि. का ये बयान हमेशा रहता है जो उन्होंने हजरे अस्वद को चूमते वक्त फरमाया था कि," मैं जानता हूँ कि तू केवल एक पत्थर है न तू मुझे कुछ नफा पहुंचा सकता है और न ही हानि अगर मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को तुझे चुमते हुए न देखा होता तो तुझे नहीं चूमता" इस कौल की व्याख्या करते हुए इमाम तबरी फरमाते हैं कि : " हजरत उमर रज़ि. ने ऐसा इसलिए कहा है, क्योंकि उस समय अरब के लोगों ने कुछ ही दिनों पहले बुतों कि पूजा को छोड़ा था इस कारण हजरत उमर रज़ि. ने सोचा कि कहीं यह लोग ये न समझने लगें कि पत्थर को चूमना उसकी पूजा करना है जैसा कि इस्लाम में दीक्षित होने से पूर्व अरब के लोग किया करते थे इसलिए हजरत उमर ने लोगों को यह बताया कि हजरे अस्वद का चूमना केवल अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के कार्यों का अनुसरण करना है, और हजरे अस्वद को इसलिए नहीं चूमा जाता कि उसके अन्दर हमें कोई लाभ पहुंचाने अथवा कोई हानि पहुंचाने की कोई शक्ति है...

..... तो ये स्पष्ट है कि हजरे अस्वद को चूमना उसकी पूजा करना भी नही है, जैसा कि हमारे कुछ भाईयों को भ्रम हुआ था ॥

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