इस्लाम की स्थापना कब और किसने की

अक्सर ये समझ लिया जाता है कि इस्लाम धर्म की स्थापना केवल 1400 वर्ष पहले हज़रत मुहम्मद सल्ल० ने की थी, और इस नाते इस्लाम एक नवीनतम धर्म है...
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.... पर ये कहना गलत होगा कि इस्लाम की स्थापना 1400 साल पहले हज़रत मोहम्मद सल्ल० ने की थी, और उसके पहले उन तमाम रीति रिवाजों का कोई अस्तित्व नहीं था जो रिवाज आज इस्लाम में हैं ... बल्कि सच ये है कि अल्लाह और उसके बहुत सारे नबियों से अरबवासी बहुत पहले से परिचित थे, रोज़ा, नमाज़, हज आदि से अरब के लोग परिचित थे... क़ाबा का हज जो वास्तव में नबी इब्राहीम अ.स. की डाली हुई प्रथा थी वो अरब के मूर्तिपूजकों द्वारा किया जाने वाला एक सबसे महत्वपूर्ण कर्मकांड था, इसी तरह ख़तना आदि जैसे कई रिवाज हज़रत इब्राहीम के अनुकरण से अरबवासी पालन करते आये थे... ये भी ज़िक्र मिलता है कि नबी सल्ल० से पूर्व काबे में मरियम अस०, हज़रत ईसा और हज़रत इब्राहीम के चित्र भी मौजूद थे, जिससे तत्कालीन मक्कावासियों के इस विश्वास का भी पता चलता है कि वे भी मानते थे कि काबे को नबी इब्राहीम अ.स. ने अमूर्त अल्लाह की भक्ति के लिये बनाया था....

क़ुरआन में अरब के मूर्तिपूजकों के विषय में बताया गया है कि वो सर्वशक्तिमान, अमूर्त ईश्वर, जिसे अरबी में अल्लाह ही कहा जाता था, (हज़रत मुहम्मद सल्ल० के जन्म से भी पहले से) में ये विश्वास रखते थे कि सृष्टि का निर्माणकर्ता और पालनहार अल्लाह ही है (सूरह अकंबूत, सूरह-29 में आयत 61 से 65), ... और अन्य देवी देवता, जिनकी मूर्तियों को वे अरब पूजते थे, इन देवी देवताओं को वो अल्लाह तक अपनी प्रार्थनाएं पहुँचाने के लिए नियुक्त अल्लाह के अधीनस्थ मानते थे (सूरह जुमर की तीसरी आयत, 39:3),
.. या कुछ देवी देवताओं को अल्लाह के पुत्र पुत्रियां या सहयोगी मानते थे (सूरह नजम 53 में आयत 18-22).... अरब के मूर्तिपूजकों के ये तर्क साबित करते हैं कि वो खुद ऊपरी तौर पर अमूर्त अल्लाह को ही एकमात्र निर्माणकर्ता ईश्वर मानते थे, और इस नाते केवल अल्लाह की ही भक्ति होनी चाहिए ये भी स्वीकार करते थे, अन्य देवी देवताओं की पूजा के लिए उनका तर्क देना वास्तव में हज के समय होने वाली मोटी कमाई का मोह न छोड़ पाने के कारण था, जो इन मूर्तियों के चढ़ावे में मिलती थी... अरब के मूर्तिपूजकों द्वारा मुसलमानों के कड़े विरोध की वजह भी ये ही थी कि मूर्तिपूजक इस्लाम को अपनी कमाई और भोगविलास की राह में रोड़ा मानने लगे थे, उनके विरोध की वजह ये नही थी कि इस्लाम उन्हें कोई नया या झूठा धर्म लगा था...!!!

... तो ऐसा नहीं कहा जा सकता कि एक दिन अचानक हज़रत मोहम्मद सल्ल० अरब के लोगों को एकदम अनजाने धर्म के बारे में बताने लगे.... बल्कि कहना ये सही होगा कि नबी सल्ल० ने धर्म के विकृत कर दिए गए स्वरूप में सुधार के प्रति लोगों को सचेत करना शुरू कर दिया उन्होंने उसी रोज़े नमाज़ हज और एकेश्वरवाद की शिक्षा दी जिन तमाम बातों से अरब और अन्य इब्राहीमी धर्मों के मानने वाले पहले से परिचित थे... अलबत्ता इन रस्मों के विकृत कर दिये गए स्वरूपों में सुधार की बात अरब के लोगों को पसंद नहीं आई, अरब के लोगों ने सच्चे धर्म से दूर होकर खुद अपने समाज में जो हिंसक और मानवता विरोधी रिवाज बना लिए थे, नबी सल्ल० ने जब ईश्वरीय अभिप्रेरण से उन रिवाजों का विरोध किया तो ये बात अरब के मूर्तिपूजकों को रास नहीं आई, जब नबी सल्ल० लोगों को नवजात बच्चियों की हत्या करने से रोकने लगे, गुलामों के साथ दुर्व्यवहार करने से लोगों को रोकने लगे , मूर्ति पूजा से लोगों को रोका और एक अल्लाह की इबादत की ओर बुलाया और आप सल्ल० की इन बातों से प्रभावित होकर मक्का के कुछ गरीब लोगों और कुछ गुलामों ने इस्लाम कुबूल कर लिया तो अरब के अमीर और प्रभावशाली वो लोग जो अपने हिंसक रीति रिवाज़ो से प्रेम करते थे, इस बात से चिढ़ गए ,और उन्होने उन गरीब नव मुस्लिमों को मार पीटकर उनका धर्म छुड़वा देना चाहा ताकि इस्लाम की कहानी शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाए

लेकिन ऐसा न हुआ, उन गरीब मुसलमानों ने खुद को बुरी तरह प्रताड़ित किए जाने के बावजूद इस्लाम का त्याग न किया, उल्टे उन नव मुस्लिमों के मुंह से इस्लाम की मानवतावादी शिक्षाओं को सुनकर इस्लाम कुबूल करने वालो की तादाद बढ़ती गई. 
लगभग 11 वर्ष तक मक्का के गैर मुस्लिमों ने मुस्लिमों पर अमानवीय अत्याचार किए ..... उन्होंने अपने अनेक गुलामो के यातनाएँ देकर अंग भंग कर दिए क्योंकि उन गुलामो ने इस्लाम कुबूल कर लिया था, और कुछ गरीब मुसलमानों को यातनाएँ दे देकर मार डाला....... लेकिन मुस्लिम शांति और इस्लाम के मार्ग पर अडिग रहे .... न मुस्लिमों ने पलटकर कभी किसी पर वार किया और न ही इस्लाम से हटे कई मुसलमान इन भयंकर तकलीफो से बचने के लिए नबी सल्ल० की सलाह पर मक्का से बाहर ऐसी जगहों पर चले गए जहाँ वे शांति से अपने धर्म इस्लाम का पालन करते हुए जीवन गुज़ार सकें.
और जब मक्का मे रहना एकदम दूभर हो गया और पैगंबर सल्ल० के कत्ल की कोशिशें मक्का के गैर मुस्लिम करने लगे तो पैगंबर मोहम्मद सल्ल० भी बाकी मुसलमानों के साथ मक्का से मदीना प्रस्थान कर गए

लेकिन इसके बावजूद मक्का के गैर मुस्लिमों ने मुसलमानों का पीछा नही छोड़ा, ... मूर्तिपूजकों ने सोचा कि यदि ये मुस्लिम इस्लाम का त्याग नहीं कर रहे हैं, तो फिर मदीना पर चढ़ाई कर के सारे मुस्लिमों की ही हत्या कर डाली जाए तो इस्लाम जड़ से खत्म हो जाएगा ...
और फिर मुस्लिमों के मदीना पहुंचने के दूसरे वर्ष, मक्का के काफिरो ने मुस्लिमों पर चढ़ाई कर दी , इसके पहले हमेशा मुस्लिमों ने काफिरो के अत्याचारों को पैगंबर स. के हुक्म पर चुपचाप बर्दाश्त कर लिया था, और यदि काफिरो की मुस्लिमों पर ये चढ़ाई केवल मुस्लिमों को बंदी बनाने, मुस्लिमो को मारने पीटने या मुस्लिमों की माल दौलत छीनने के लिए होती तो बात कुछ और होती, लेकिन अब तो सारे मुस्लिमों की हत्या कर के इस्लाम के खात्मे का अरमान लेकर काफिरो ने चढ़ाई की थी, अत: मुस्लिमों की जान की हिफाज़त के लिए और इस्लाम का अस्तित्व बचाने के लिए मुस्लिमों को आत्मरक्षा मे युद्ध की इज़ाज़त दी गई... इसके बाद भी पैगम्बर स. के जमाने मे काफिरो ने बार बार मुस्लिमों पर चढ़ाई की और मुस्लिमों ने सदा आत्मरक्षा मे और काफिरो से मुस्लिमों की जान बचाने के लिए बहुत मजबूर होकर तलवार उठाई.... इस्लाम का इतिहास पढ़ने पर हमें कहीं इस्लाम का प्रसार करने के लिए दूसरे समुदायों पर आक्रमण करने की शिक्षा नही मिलती, जिसका अक्सर इस्लाम विरोधी आरोप लगाया करते हैं.... देखें तो वास्तव में इस्लाम वही धर्म है जिस मानवीय धर्म की समझ हर मनुष्य में प्राकृतिक रूप से मौजूद होती है, इसलिए जो भी व्यक्ति इस्लाम का अध्ययन समझने की मंशा से करता है, वो समझ जाता है कि ये वही एकमात्र धर्म है जो दुनिया की पहली सभ्यता के साथ दुनिया में आया था, जिसमें दया, प्रेम और न्याय की ही शिक्षाएं दी गई हैं और जो बिना किसी माध्यम या आडम्बर के केवल ध्यान के द्वारा सीधे सर्वोच्च ईश्वर से संवाद का मार्ग बताता है... इतना कुछ जानने के बाद व्यक्ति खुद इस धर्म को पसंद करने लगता है, और इस धर्म को बिना किसी के डराए वो स्वयं स्वेच्छा से स्वीकार लेता है !!

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