औरत और पर्दा
( इस्लाम से जुड़े अपने सवालों के जवाब ढूंढते ढूंढते मैं अपने उन मामू के पास जा पहुँचा था, जिनके इस्लामी इल्म का दायरा काफ़ी बड़ा था, ... उनके पास पहुँचकर बिना वक्त गवांए मैं खोद खोद कर तमाम सवाल करता चला जा रहा था और वो सुकून से मेरी हर बात का इत्मीनान कर देने वाले जवाब देते चले जा रहे थे...)
"अच्छा मामू ये बताइये औरतों को मुंह तक काले कपड़े से ढक कर रखना ... ये इस्लाम में क्यों बताया गया है ? कहते हैं कि गैर मर्दों की नीयत खराब होती है इसलिये औरत को पर्दा करना चाहिए, पर इसका क्या मतलब कि गुनाह मर्द के दिल में हो और क़ैद औरत को कर दिया जाए ? किसी और के जुर्म की सज़ा किसी और को देना, ये तो इंसाफ नही है न ? नीयत अगर मर्द की खराब है तो इंसाफ तो ये था कि मर्द पर उसकी नीयत को सही रखने की सख्ती की जाती और मर्द के न मानने पर सज़ा का डर दिखाया जाता, मगर यहाँ मर्द को तो उल्टे पब्लिक प्लेस में भी शर्टलेस होने की आज़ादी दे दी गई मगर औरत को बाहर निकलने पर अपना मुंह तक बन्द करना पड़ेगा चाहे आंखें ढकी होने की वजह वो सही से देख भी न पाए और गिर ही पड़े, ऐसा मैंने बहुत पुरानी बंगाली मुस्लिम औरत के संस्मरण में पढ़ा था कि बुर्के के कारण महिलायें गिर पड़ा करती थीं..." मैं मामू से बेबाक़ी से सवाल कर रहा था क्योंकि मुझे उम्मीद थी मामू दूसरों की तरह भड़क कर मुझपर कोई इल्ज़ाम लगाने की बजाय, कोई बेहतर जवाब ही देंगे...
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.... "बेटा, बिल्कुल ठीक इंसाफ का तकाज़ा यही है कि जो गुनाह करे सज़ा भी उसी को मिले और इस्लाम इंसाफ के इसी क़ानून पर चलता है कि मर्द अगर औरत के साथ बलात्कार करेगा तो उसको मौत की सज़ा दी जाएगी... इस खतरनाक सज़ा के डर से मर्द अपनी नीयत को ठीक ही रखेगा... "
... अल्लाह ने सूरह नूर में औरतों को पर्दे का हुक्म देने से पहले मर्दों को पर्दे का हुक्म दिया है कि ईमानवाले मर्द अपनी नज़रों की सुरक्षा करें यानी पराई स्त्रियों को गलत निगाह से कतई न देखें, और अपने चरित्र की रक्षा करें यानी किसी पराई स्त्री को अपने पास न आने दें, फिर इसके बाद अल्लाह ने औरतों को यही हुक़्म दिया है..."
...."बहुत अच्छी बात बताई मामू आपने कि अल्लाह ने पहले मर्द से पर्दा करने को कहा, ...पर मामू औरतों को ज़्यादा बदन छिपाने की बात क्यों ?"
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"बेटा, औरत और मर्द के बीच कुछ फिज़िकल डिफरेंस होने की वजह से औरत को अपने बदन के वो कुछ हिस्से भी छिपाने पड़ते हैं जिन्हें मर्द को छिपाना उतना ज़रूरी नहीं है, जैसे मर्द का सीना.... हालांकि एक शर्मदार मुसलमान मर्द को अपना सीना भी गैर औरतों के आगे नही खोलना चाहिये, ये तहज़ीब हमें इस्लामी हस्तियों की ज़िंदगी से सीखने को मिलती है.."
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... "मामू आपकी बात बिल्कुल ठीक है कि औरतों के बदन का शर्ट वाला हिस्सा छिपाना ही सभ्य लगता है, लेकिन मामू, मेरा मेन सवाल औरतों के चेहरे ढकवाने पर है, जो लोग अपनी खुशी और मर्ज़ी से ढकती हैं, वो तो ठीक है, पर जिन औरतों पर दबाव डालकर मुंह ढकवाया जाता था, मेरा सवाल उनके बारे में है, जिन्हें जबरदस्ती के इस पर्दे से घुटन भी होती होगी और परेशानी भी, ये औरतों पर ज़्यादा और नाइंसाफ बंदिश वाली बात हो गई न मामू ??" मैंने पूछा
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..."बेटा, तुम्हारा कहना सही है और औरतों को घरों में क़ैद रखने वाला पर्दा नबी के दौर में था भी नही, तब मस्जिद में भी औरतें जाती थीं, तिजारत भी किया करती थीं, अहादीस में है कि जंगों में भी मुस्लिम औरतें जाती थीं, तो ये औरतों को चार दीवारी में बंद करने का तरीका नबी या सहाबा का तो था नही, ये तो ईरानी, भारतीय और यहां की दुसरी सभ्यताओं में था कि औरत कपड़े की गठरी बनी घर में छिपी रहे.... इस्लाम मे ऐसा नहीं है औरत को चेहरा छिपाने की, हथेलियां और पैर छिपाने की बाध्यता इस्लाम में नही है... जब हम हज करने गए थे, हमने क़ाबा शरीफ़ में औरतों और मर्दों को एक साथ तवाफ़ और नमाज़ अदा करते देखा, वहां तमाम औरतों के चेहरे खुले थे, इसी शक्ल में पिछले 1400 सालों से औरतें हज करने जाती रही हैं इस परिधान का हुक़्म प्यारे नबी सल्ल० ने मुसलमान औरतों को दिया है, यानी मर्दों के सामने पड़ने के लिये औरतों को नबी सल्ल० ने जितने पर्दे का हुक़्म दिया वो इतना ही है, .. चेहरा ढककर जो वो बेचारी बंगाली औरतें गिर रही थीं ये रिवाज ईरानियों के यहां था औरत का मुंह तक ढका जाए... जब ईरान में इस्लाम आया उन्होंने अपनी कुछ पुरानी परम्पराओं को भी इसमें मिलाजुला दिया और जब यही ईरानी भारत आये तो यहां के लोगों ने भी बुर्के को इस्लाम का ही पार्ट समझ लिया... हालांकि क़ुरआन की सूरह नूर की 31वीं आयत जहां पर्दे का ज़िक्र है वहां ये बात स्पष्टता से कही गई है कि औरतों के शरीर का वो हिस्सा जो खुला रहना आवश्यक है, उसे छोड़कर बाक़ी शरीर वो पराये मर्दों के आगे ढंकें... और आवश्यक रूप से खुले रहने वाले वो हिस्से चेहरा, हथेलियां और पैर हैं ये औरतों का हज का पहनावा साबित कर देता है
.... अब तो यूरोप और सारी दुनिया में मुस्लिम औरतों ने चेहरा ढकने वाले नकाब की बजाए "अबया" पहनना शुरू कर दिया है जिसमें सर ढका रहता है मगर चेहरा खुला रहता है, जब वहां की आज़ाद माहौल में पली बढ़ी औरतों को पता चल रहा है कि इस्लाम में पर्दा इतना आसान है तो जो लोग अब तक मुह ढकने के डर से पर्दा नही करती थीं वो भी तेज़ी से अबया को अपना रही हैं....!!" मामू ने आखरी बात कहते हुए खुशी से मेरी तरफ देखा जो दिलचस्पी से उनकी बातें सुन रहा था
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..." और जब मैं ऐसी मिसालें दुनिया में देखता हूँ कि इस्लाम में ज़्यादा बंदिशों की कल्पना से जो लोग इस्लाम से दूर हो गए थे, उन्होंने जब क़ुरआन और हदीस का इस्लाम समझा तो बेजा बन्दिश न पाई और इस्लाम के करीब आ गए तो मुझे प्यारे नबी सल्ल० की वो हदीस याद आती है जो सही बुख़ारी, क़िताब-3, हदीस-69 पर दर्ज है और अनस बिन मलिक रज़ि० से रिवायत है कि नबी सल्ल० ने एक मकाम पर सहाबा से फ़रमाया कि "दीन में आसानी पैदा करो, दुश्वारी न पैदा करो, लोगों को नेक कामों के अज्र की ख़ुशख़बरी सुनाओ न कि उन्हें दीन से दूर भागने पर मजबूर कर दो"
... हमारे उलमा को नबी सल्ल० की इस तालीम पर ध्यान देने की, अमल करने की ज़रूरत है...!!"
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